छत्तीसगढ़ के इस गांव में रावण दहन नहीं होता, वध के बाद निभाई जाती है अनोखी रस्म

कोंडागांव।’ देशभर में दशहरे के अवसर पर रावण के पुतले का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है। लेकिन छत्तीसगढ़ में एक ऐसी परंपरा भी चर्चा में रहती है, जहां रावण दहन के बजाय उसका वध किया जाता है। इस अनोखी परंपरा में ग्रामीण रावण की नाभि से निकले कथित ‘अमृत’ का तिलक लगाते हैं। यह परंपरा स्थानीय मान्यताओं, धार्मिक आस्था और वर्षों से चली आ रही लोक-संस्कृति से जुड़ी हुई है।
रावण दहन से अलग है यहां की परंपरा
दशहरा भगवान श्रीराम की ओर से रावण के वध और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है। देश के अधिकांश हिस्सों में इस दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं। वहीं, छत्तीसगढ़ के इस विशेष स्थान पर दशहरे का आयोजन अलग अंदाज में किया जाता है। यहां रावण के पुतले को जलाने के बजाय उसके वध की रस्म निभाई जाती है।

इस परंपरा को देखने के लिए स्थानीय लोगों के साथ आसपास के गांवों से भी ग्रामीण पहुंचते हैं। आयोजन के दौरान धार्मिक उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों का विशेष महत्व रहता है।
नाभि से निकले ‘अमृत’ का तिलक लगाने की मान्यता
इस दशहरा परंपरा की सबसे खास बात रावण की नाभि से निकले ‘अमृत’ का तिलक लगाना है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, रावण की नाभि में अमृत होने की कथा रामायण से जुड़ी है। इसी विश्वास के आधार पर यहां रावण वध के बाद तिलक लगाने की परंपरा निभाई जाती है।
धार्मिक कथाओं के अनुसार, रावण को पराजित करने के लिए भगवान श्रीराम ने उसकी नाभि में स्थित अमृत को सुखाने के बाद उसका वध किया था। हालांकि, इस रस्म का वास्तविक स्वरूप और इससे जुड़ी मान्यताएं स्थानीय परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं।
लोक-संस्कृति और आस्था का अनूठा संगम
छत्तीसगढ़ अपनी विविध लोक-संस्कृतियों, आदिवासी परंपराओं और विशिष्ट धार्मिक आयोजनों के लिए जाना जाता है। यहां कई पर्व ऐसे तरीके से मनाए जाते हैं, जो देश के दूसरे हिस्सों से अलग दिखाई देते हैं। दशहरे की यह परंपरा भी इसी सांस्कृतिक विविधता का उदाहरण है।
स्थानीय लोगों के लिए यह आयोजन केवल धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा को आगे बढ़ाने का अवसर भी है। ऐसे आयोजन क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।



