Netagiri.in___कोरबा / छत्तीसगढ़___यह सुनने में अजीब लग सकता है कि जमीन उड़कर या चलकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंच जाए, लेकिन कोरबा जिले में राजस्व तंत्र की कथित मिलीभगत से यह करिश्मा कागजों में कर दिखाया गया है। गांव के एक कोने में स्थित कृषि भूमि को कागजी खेल के जरिए करीब 2 किलोमीटर दूर ले जाकर मुख्य मार्ग से लगी करोड़ों रुपये की बेशकीमती शासकीय भूमि पर स्थापित कर दिया गया।
मामला कोरबा तहसील अंतर्गत राजस्व ग्राम दादरखुर्द का है, जहां खसरा नंबर 206 (पुराना) रकबा 1.84 एकड़ भूमि को फर्जी तरीके से स्थानांतरित कर खरमोरा–दादरखुर्द मुख्य मार्ग पर स्थित शासकीय खसरा नंबर 273 एवं 274 पर कब्जा स्थापित किया गया।
किसकी जमीन, कहां की जमीन?
जानकारी के अनुसार ग्राम दादरखुर्द में पुराना मसाहती खसरा नंबर 206, रकबा 1.84 एकड़ भूमि पहले हीराबाई पति गोबिंद के नाम दर्ज थी। वर्ष 2000 के आसपास इस जमीन को लक्ष्मण राव पिता नारायण राव ने तत्कालीन पटवारी से सांठगांठ कर फर्जी तरीके से अपने नाम दर्ज करा लिया।
बाद में बंदोबस्त प्रक्रिया (2005-06) के दौरान इस भूमि को योजनाबद्ध तरीके से भू-माफिया नरोत्तम राव घाड़गे एवं उसके पोड़ीबहार, कोरबा निवासी साथियों ने अपने रिश्तेदार हरिहर राव मगर पिता खेमंत राव मगर, निवासी एनटीपीसी दर्री के नाम पर दर्ज करा दिया।
बंदोबस्त के बाद उक्त भूमि के नए खसरा नंबर 1566, 1570 एवं 1572 दर्ज हुए, जिनका वास्तविक मूल स्थान आज भी बोईरमुड़ा खार (कुम्हार पारा) क्षेत्र में गांव के एक कोने पर स्थित है।
फर्जी आदेश से जमीन का “स्थान परिवर्तन”
सूत्रों के अनुसार हरिहर राव मगर, नरोत्तम राव घड़गे और एक स्थानीय भू-माफिया ने बेजा आर्थिक लाभ के उद्देश्य से तत्कालीन अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) कोरबा – गजेन्द्र सिंह ठाकुर से सांठगांठ कर एक संगठित योजना बनाई।
पटवारी जांच प्रतिवेदन अस्पष्ट होने के बावजूद छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 89 के अंतर्गत राजस्व प्रकरण क्रमांक 58/अ-6-अ/2014-15 में 27 अप्रैल 2016 को कथित रूप से मोटी रिश्वत देकर अपने पक्ष में आदेश पारित करवाया गया।
इसी आदेश के आधार पर गांव के अंदर स्थित कृषि भूमि को कागजों में हटाकर उसे खरमोरा-दादरखुर्द मुख्य मार्ग से लगी शासकीय भूमि (खसरा 273 एवं 274) पर स्थापित कर दिया गया, जो कि मूल स्थान से लगभग 2 किलोमीटर दूर है।
कब्जे के लिए विवाद, करोड़ों में बेचने की तैयारी
सूत्रों का दावा है कि आरोपितों द्वारा उक्त शासकीय भूमि को करोड़ों रुपये में बेचने का प्रयास भी किया जा रहा है। कब्जा मजबूत करने के लिए आसपास के किसानों से जानबूझकर विवाद खड़े किए जा रहे हैं, ताकि बाद में इसे निजी भूमि साबित किया जा सके।
पहले भी सामने आ चुका है बेजा कब्जे का मामला
उल्लेखनीय है कि बोईरमुड़ा खार (कुम्हार पारा) क्षेत्र की इसी भूमि एवं उससे लगी शासकीय जमीन को पहले भी नरोत्तम राव घाड़गे और उसके परिवार द्वारा पोड़ीबहार, कोरबा निवासी व्यक्ति को लाखों रुपये में बेजा कब्जा-मलमामय के रूप में बेचने का मामला सामने आ चुका है।
इस मामले की शिकायत उच्च अधिकारियों से की गई थी, जिस पर जांच कराई गई और पटवारी द्वारा जांच प्रतिवेदन संबंधित जांच अधिकारी को सौंप दिया गया है। सूत्रों का कहना है कि इस प्रकरण में शीघ्र कार्रवाई संभावित है।
कलेक्टर से शिकायत, उच्च स्तरीय जांच की मांग
पूरे प्रकरण की शिकायत कलेक्टर कोरबा सहित उच्च अधिकारियों से की गई है। शिकायतकर्ता ने मांग की है कि—
जमीन को पुनः उसके मूल स्थान पर स्थापित किया जाए
फर्जी आदेशों की उच्च स्तरीय जांच हो
राजस्व अधिकारियों, भू-माफिया और दलालों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए
अब बड़ा सवाल यह है कि—
क्या कागजों में उड़ाई गई जमीन वापस अपने असली स्थान पर लौटेगी?
या फिर करोड़ों की शासकीय भूमि यूं ही भू-माफियाओं की भेंट चढ़ती रहेगी?


