
Netagiri.in____6 March…..कोरबा। वेदांता समूह की कंपनी भारत एल्यूमिनियम कंपनी लिमिटेड (बालको) की सामुदायिक विकास पहल ‘उन्नति’ परियोजना ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में अहम भूमिका निभा रही है। इस पहल से जुड़कर लालघाट क्षेत्र की निवासी गंगोत्री विश्वकर्मा ने अपनी जिंदगी की दिशा ही बदल दी। कभी मजदूरी कर परिवार का पालन-पोषण करने वाली गंगोत्री आज मशरूम उत्पादन के जरिए आत्मनिर्भर बन चुकी हैं और क्षेत्र में ‘मशरूम दीदी’ के नाम से पहचानी जाती हैं।
गंगोत्री बताती हैं कि पहले उनका जीवन रोज़ की मजदूरी पर निर्भर था। काम मिले तो घर का चूल्हा जलता, नहीं मिले तो परिवार की चिंता सताती रहती थी। वर्ष 2019 में बालको की उन्नति परियोजना के तहत उन्हें जय मां हर्षिता स्व-सहायता समूह से जुड़ने और मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण लेने का अवसर मिला। यही प्रशिक्षण उनकी जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ।
प्रशिक्षण के बाद उन्होंने मशरूम की खेती शुरू की। शुरुआत में 16 बैग लगाए, लेकिन पहली बार में सिर्फ 2 बैग में ही मशरूम तैयार हुआ। हालांकि गंगोत्री ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी गलतियों से सीख ली और दोबारा मेहनत शुरू की। धीरे-धीरे उत्पादन बढ़ता गया और आज उनकी मशरूम इकाई में लगभग 200 बैग तक उत्पादन हो रहा है।
मशरूम की खेती में 20-25 दिनों के भीतर पैदावार शुरू हो जाती है और सप्ताह के अंतराल में तीन बार फसल मिलती है। उत्पादन लगातार बना रहे, इसके लिए गंगोत्री रोज़ लगभग दो नए बैग तैयार करती हैं। मशरूम उत्पादन की वैज्ञानिक विधि में पैरा-कुट्टी को भिगोकर हल्की नमी के साथ तैयार किया जाता है और पोषण व रोग नियंत्रण के लिए आवश्यक पाउडर मिलाकर बैग बनाए जाते हैं, जिससे बेहतर पैदावार मिलती है।
गंगोत्री अपनी पूरी उपज खुद बाजार में बेचती हैं। शुरुआती दौर में बालको सीएसआर से उन्हें काफी सहयोग मिला, जिससे उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा। आज वे खुद मशरूम का बीज मंगवाती हैं और अपने समूह की अन्य महिलाओं को भी उपलब्ध कराती हैं। वर्तमान में वे जय मां हर्षिता स्व-सहायता समूह की सचिव के रूप में भी कार्य कर रही हैं।
कोविड काल उनके परिवार के लिए सबसे कठिन समय था, जब उनके पति की आय लगभग बंद हो गई थी। ऐसे समय में मशरूम की खेती ही उनके परिवार का सहारा बनी। इसी आय से उन्होंने न सिर्फ घर का खर्च चलाया बल्कि थोड़ी बचत भी की और एक ऑटो रिक्शा खरीदने में सफल रहीं। आज उनके पति उसी ऑटो को चलाते हैं और समय मिलने पर गंगोत्री के काम में सहयोग भी करते हैं।
मशरूम उत्पादन से गंगोत्री को औसतन प्रति माह लगभग 15 हजार रुपये का लाभ हो रहा है। अब वे अपने बच्चों की पढ़ाई को लेकर निश्चिंत हैं। उनका सपना है कि आने वाले समय में मशरूम उत्पादन को 200 बैग से बढ़ाकर 5 हजार बैग तक पहुंचाएं, ताकि उनके साथ अन्य महिलाएं भी आत्मनिर्भर बन सकें।
गंगोत्री कहती हैं कि सही प्रशिक्षण, संस्थागत सहयोग और मजबूत हौसलों से कोई भी महिला अपने जीवन की दिशा बदल सकती है।


