
Netagiri.in_____Renu jaiswal (9827799070)____कोरबा। कोरबा जिले में कोयला खदानों के लगातार विस्तार, हसदेव अरण्य की कटाई और बांगो बांध से हुए विस्थापन का दर्द एक बार फिर सुर्खियों में है। विस्थापित परिवारों के हक़ और भविष्य को लेकर कोरबा में जल्द ही प्रदेश स्तरीय विस्थापन पीड़ितों का महासम्मेलन आयोजित किया जाएगा। इस आंदोलन को छत्तीसगढ़ बचाव आंदोलन का भी समर्थन प्राप्त है।
विस्थापन, आजीविका और अस्तित्व पर मंडराता संकट
1960 के दशक से शुरू हुआ कोरबा का औद्योगिक विस्तार आज विस्थापन की सबसे बड़ी त्रासदी में बदल चुका है। जहां कभी उपजाऊ खेत और घने जंगल हुआ करते थे, वहां अब कोयले की खदानें और धूल का अंधकार है। वक्ताओं ने कहा कि यह संकट सिर्फ जमीन छिनने तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले वर्षों में लाखों लोगों की आजीविका, पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा पर गहरा असर डालने वाला है।
कृषि और पर्यावरण पर दोहरा खतरा
लगातार हो रहे खनन कार्यों से जिले की बहुमूल्य कृषि भूमि उजड़ चुकी है। बांगो बांध और हसदेव अरण्य की कटाई से जल स्रोत और पारिस्थितिकी पर गहरा संकट उत्पन्न हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति जारी रही, तो आने वाली पीढ़ियों के सामने खाद्य सुरक्षा और जीवन-यापन की गंभीर चुनौती खड़ी हो जाएगी।
रोजगार और खदान बंदी का भविष्य संकट
वक्ताओं ने चेतावनी दी कि आने वाले 20 वर्षों में अधिकांश कोयला खदानें बंद होने लगेंगी। ऐसे में जब कृषि पहले ही नष्ट हो चुकी है, तो लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी का क्या होगा? आंदोलनकारियों का कहना है कि एसईसीएल को केवल मुनाफे के लिए नहीं, बल्कि प्रभावितों की जिम्मेदारी के लिए भी जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।
कानून की अनदेखी और अधिग्रहण की मनमानी
विस्थापितों ने आरोप लगाया कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 का लगातार उल्लंघन किया जा रहा है। धारा 101 के अनुसार, पांच वर्षों तक अनुपयोगी रहने पर भूमि किसानों को लौटाई जानी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है।
कई स्थानों पर तो डंडे और बंदूक की नोक पर गांव खाली कराने जैसी कार्रवाई भी की जा रही है।
छोटे खातेदारों को सबसे बड़ा नुकसान
रोजगार नीति में बदलाव से छोटे किसानों को सबसे अधिक मार झेलनी पड़ी है। पहले “प्रति खाते पर रोजगार” का प्रावधान था, जिसे बदलकर “दो एकड़ पर एक रोजगार” कर दिया गया। इसके चलते छोटे खातेदार पूरी तरह आजीविका से वंचित हो गए हैं। यहां तक कि हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद एसईसीएल रोजगार देने से इंकार कर रही है।
‘आंदोलन ही आखिरी रास्ता’
आंदोलनकारियों का कहना है कि अब यह लड़ाई सिर्फ मुआवजे या नौकरी तक सीमित नहीं रह सकती — यह कोरबा के अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी है। आने वाले समय में होने वाले इस महासम्मेलन में राज्य भर के विस्थापित, सामाजिक कार्यकर्ता और किसान आंदोलन से जुड़े नेता शामिल होंगे।
इस दौरान कोरबा के भू-विस्थापितों की मांगों को लेकर आगे की रणनीति तय की जाएगी ताकि हर प्रभावित परिवार को उसका हक़ और न्याय मिल सके


