कोरबा जिले में पंचायत राज लागू, पर ठेकेदारी प्रथा हावी — कैसे सक्षम होंगी ग्राम पंचायतें?…. 50 लाख तक के काम ग्राम पंचायतों के अधिकार में, फिर भी ठेकेदारों का बोलबाला.. जनपद के ऑपरेटर और बाबू भी बने हैं ठेकेदार

Netagiri.in—–रेनू जायसवाल की रिपोर्ट—--कोरबा (छत्तीसगढ़) — छत्तीसगढ़ में ग्राम स्वराज की भावना को साकार करने के लिए पंचायत राज व्यवस्था लागू की गई थी। उद्देश्य था — ग्रामीण क्षेत्रों में स्वशासन को मजबूत कर विकास की धारा गांवों तक पहुंचाना।
लेकिन कोरबा जिले में यह व्यवस्था अब भी ठेकेदारी प्रथा के शिकंजे में जकड़ी दिखाई दे रही है। अधिकार तो पंचायतों को मिले हैं, मगर असली नियंत्रण ठेकेदारों और बाहरी एजेंसियों के हाथों में है।
ग्राम पंचायतों की भूमिका सीमित, ठेकेदारों का वर्चस्व कायम
राज्य सरकार ने हाल ही में ग्राम पंचायतों को 50 लाख रुपये तक के निर्माण कार्यों को संपन्न कराने का अधिकार दिया है, ताकि स्थानीय रोजगार बढ़े और पंचायतें आत्मनिर्भर बनें।
लेकिन हकीकत यह है कि कोरबा जिले की अधिकांश पंचायतों में नाली, सीसी सड़क, भवन निर्माण और अन्य विकास कार्य अब भी ठेकेदारों के माध्यम से ही कराए जा रहे हैं।
*विवाद और शिकायतें जारी*
कोरबा जिले में कई पंचायतों में निर्माण कार्यों में अनियमितता और वित्तीय गड़बड़ियों की शिकायतें सामने आई हैं।
कई जगहों पर लाखों रुपए की रिकवरी के प्रकरण बने हैं, और जांच के नाम पर सरपंचों व सचिवों से अवैध वसूली की शिकायतें भी आई हैं।
ग्रामीण इलाकों में अक्सर एक ही ठेकेदार को बार-बार टेंडर मिलने और अधिकारियों द्वारा पसंदीदा ठेकेदारों को काम सौंपने की बात सामने आती रहती है। और तो और जनपदों में बैठे ऑपरेटर और बाबू तक ठेकेदारी कर रहे हैं जिसकी भनक उच्च अधिकारियों को नहीं लग पाती है
कोरबा और करतला जनपद क्षेत्रों में दो ठेकेदारों — पप्पू खान (कोरबा) और नीरज मिश्रा (करतला) — के नाम इन दिनों काफी चर्चित हैं।
जनप्रतिनिधियों का कहना है कि अगर पंचायतों को वास्तविक कार्य एजेंसी बनाया जाए, तो स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा और विकास कार्यों में पारदर्शिता भी बढ़ेगी।
ठेकेदारी से बढ़ता भ्रष्टाचार और रिकवरी का डर
ठेकेदारी प्रणाली में पंचायतों से किसी भी तरह का औपचारिक अनुबंध नहीं होता। परिणामस्वरूप, जब कोई कार्य अधूरा या घटिया निकलता है, तो रिकवरी का भार सरपंच और सचिव पर डाल दिया जाता है, जबकि असली जिम्मेदार ठेकेदार बच निकलते हैं।
“ठेकेदारी व्यवस्था ग्राम स्वराज की आत्मा को कमजोर करती है”
स्थानीय ग्रामीण और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि ठेकेदारी व्यवस्था से ग्राम लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होती है।
यदि पंचायतों को स्वतंत्र निर्माण एजेंसी का दर्जा दिया जाए और ब्लॉक स्तर पर तकनीकी सहायता प्रकोष्ठ (Technical Cell) गठित किया जाए, तो ग्राम स्तर पर जवाबदेही और दक्षता दोनों में सुधार होगा।
सशक्त पंचायतों का सपना अभी अधूरा
कोरबा जिले में पंचायत राज व्यवस्था कागजों पर भले ही लागू हो, लेकिन ठेकेदारी प्रथा की हकीकत ने इस व्यवस्था के असली उद्देश्य को कमजोर कर दिया है।
यदि राज्य सरकार पंचायतों को वास्तविक रूप से छोटे निर्माण कार्यों की एजेंसी घोषित करती है, तो इससे न केवल गांवों में रोजगार और पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि ग्राम स्वराज की परिकल्पना भी साकार हो सकेगी।
ग्राम प्रतिनिधियों का कहना है कि योजनाओं की राशि पंचायत के खाते में आती जरूर है, लेकिन कार्यादेश और तकनीकी स्वीकृति सीधे ठेकेदारों को मिल जाती है। ऐसे में पंचायतों की भूमिका सिर्फ कागज़ी औपचारिकता तक सीमित रह जाती है।जनप्रतिनिधियों का असंतोष — “हमारे गांव में हमारे हाथ बंधे हैं”
कई सरपंचों और जनप्रतिनिधियों ने इस व्यवस्था पर नाराज़गी जताई। उनका कहना है कि ठेकेदारी प्रथा के कारण न तो स्थानीय श्रमिकों को काम मिल पाता है, न ही गुणवत्ता पर नियंत्रण रह जाता है।
अक्सर ठेकेदार और जनपद सीईओ की मिलीभगत से कार्यों का निष्पादन होता है।
“गांव की योजनाओं पर पंचायतों की मुहर लगती है, लेकिन काम कौन करेगा, यह हमें नहीं बताया जाता,” एक जनपद क्षेत्र के सरपंच ने नाम न बताने की शर्त पर कहा।


