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Netagiri.in–बच्चों के पोषण आहार पर सवाल: पाली परियोजना में आधे वितरण और कमीशन के आरोपकोरबा/पाली। महिला एवं बाल विकास विभाग की पाली परियोजना में बच्चों, गर्भवती महिलाओं, शिशुवती माताओं और किशोरी बालिकाओं के लिए संचालित पूरक पोषण आहार योजना गंभीर आरोपों के घेरे में आ गई है। रेडी टू ईट पोषण आहार की आपूर्ति और वितरण को लेकर सामने आए आरोपों ने विभागीय निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
बीते सप्ताह मंगलवार को पोड़ी, सिल्ली, लाफा, माखनपुर, सपलवा सहित कई सेक्टरों की आंगनबाड़ियों में रेडी टू ईट उपलब्ध नहीं होने की शिकायत सामने आई थी। मामला सामने आने के बाद संबंधित क्षेत्रों में आनन-फानन में पोषण आहार पहुंचाए जाने की बात कही जा रही है। अब आरोप है कि यह मामला महज आपूर्ति में देरी तक सीमित नहीं है।
दर्ज हितग्राहियों के मुकाबले कम वितरण का आरोप
विभागीय सूत्रों के हवाले से आरोप लगाए जा रहे हैं कि कुछ आंगनबाड़ी केंद्रों में दर्ज हितग्राहियों की संख्या के अनुपात में पूरा रेडी टू ईट उपलब्ध नहीं कराया जाता। आरोप है कि कई जगह निर्धारित मात्रा की तुलना में आधा या उससे भी कम पोषण आहार वितरित किया जाता है और शेष पैकेटों को कथित रूप से वापस करने अथवा अन्यत्र खपाने की बात सामने आ रही है।
कुछ सूत्रों ने प्रति पैकेट 10 रुपये तक कथित कमीशन दिए जाने का भी दावा किया है। हालांकि इन आरोपों की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
हर महीने लाखों के भुगतान का हिसाब जरूरी
सूत्रों के अनुसार करीब 812.50 ग्राम के एक रेडी टू ईट पैकेट की लागत लगभग 40 से 50 रुपये बताई जा रही है। वहीं पाली परियोजना में 14 सेक्टरों के अंतर्गत बड़ी संख्या में आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं और हजारों हितग्राही दर्ज हैं। सूत्रों के मुताबिक संबंधित समूह को रेडी टू ईट के लिए हर महीने करीब 20 से 22 लाख रुपये का भुगतान किया जाता है।
ऐसे में सवाल उठता है कि शासन से जिन हितग्राहियों के नाम पर भुगतान किया जा रहा है, क्या उसी अनुपात में पोषण आहार वास्तव में हितग्राहियों तक पहुंच रहा है? उत्पादन से लेकर उठाव, परिवहन, स्टॉक और वितरण तक के रिकॉर्ड का मिलान होना जरूरी है।
निगरानी व्यवस्था पर भी उठे सवाल
मामले में रेडी टू ईट आपूर्तिकर्ता समूह के साथ-साथ परियोजना अधिकारी, सेक्टर सुपरवाइजर और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं।
यदि किसी केंद्र पर निर्धारित मात्रा से कम पोषण आहार पहुंच रहा था तो स्टॉक रजिस्टर, वितरण पंजी और वास्तविक हितग्राही संख्या के बीच अंतर विभागीय अधिकारियों की नजर में क्यों नहीं आया? लगाए जा रहे आरोपों में अधिकारियों और कर्मचारियों की कथित मिलीभगत की बात भी कही जा रही है, जिसकी स्वतंत्र जांच आवश्यक है।
कागजों में पूरा वितरण, जमीन पर कितना?
पूरे मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए पिछले कई महीनों का आंगनबाड़ीवार रिकॉर्ड खंगालना जरूरी होगा। दर्ज हितग्राहियों की संख्या, स्वीकृत मात्रा, समूह द्वारा तैयार रेडी टू ईट, केंद्रों तक पहुंचाई गई सामग्री, स्टॉक रजिस्टर और वास्तविक वितरण का मिलान कराया जाना चाहिए।
इसके साथ ही बची हुई सामग्री का रिकॉर्ड और भुगतान से संबंधित दस्तावेजों की भी जांच आवश्यक है। यदि दस्तावेजों में पूरा वितरण दर्ज हो और भौतिक सत्यापन में कमी पाई जाए तो मामला गंभीर वित्तीय एवं प्रशासनिक अनियमितता का रूप ले सकता है।
बच्चों के निवाले पर आरोप, प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग
पूरक पोषण आहार योजना का उद्देश्य कुपोषण से लड़ना और जरूरतमंद बच्चों एवं महिलाओं को पर्याप्त पोषण उपलब्ध कराना है। ऐसे में यदि कमीशनखोरी या निर्धारित मात्रा से कम वितरण के आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो यह बेहद गंभीर मामला होगा।
प्रशासन को चाहिए कि केवल हालिया आपूर्ति की जांच तक सीमित न रहते हुए पिछले कई महीनों के उत्पादन, उठाव, परिवहन, सेक्टरवार आपूर्ति, आंगनबाड़ीवार स्टॉक और हितग्राहीवार वितरण का रिकॉर्ड जांचे। बिना पूर्व सूचना के आंगनबाड़ी केंद्रों का भौतिक सत्यापन भी कराया जाए।
यदि जांच में अनियमितता प्रमाणित होती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई के साथ शासकीय राशि की वसूली भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन बच्चों और महिलाओं के पोषण के लिए हर महीने लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं, उनका पूरा पोषण आहार वास्तव में हितग्राहियों तक पहुंच रहा है या नहीं?


