
Netagiri.in____कोरबा। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। समग्र शिक्षा अभियान के तहत आवंटित लगभग 90 लाख रुपए में से करीब 70 लाख रुपए खर्च नहीं हो सके हैं, जो अब लैप्स होने की कगार पर हैं। आरोप है कि यह स्थिति प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) तामेश्वर प्रसाद उपाध्यक्ष के कथित ‘मौखिक आदेश’ के कारण बनी।
जानकारी के अनुसार, यह राशि स्कूलों के माध्यम से लैब मेंटेनेंस, आईटी, हेल्थ, एग्रीकल्चर और ऑटोमोबाइल जैसे व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यों पर खर्च की जानी थी। नियमतः प्रधानपाठकों को इस राशि के उपयोग का अधिकार था, लेकिन उन्हें स्वतंत्र रूप से खरीदी करने से रोक दिया गया।
सूत्रों के मुताबिक, प्रभारी DEO द्वारा कथित तौर पर प्रधानपाठकों पर दबाव बनाया गया कि वे केवल तय किए गए ठेकेदारों से ही सामग्री खरीदें। चर्चा है कि इस प्रक्रिया के जरिए ऊंचे दामों पर सामान सप्लाई कर लाभ पहुंचाने की कोशिश की जा रही थी। इसके चलते समय पर खरीदी नहीं हो सकी और राशि खर्च नहीं हो पाई।
छात्रों के भविष्य पर असर
वित्तीय वर्ष की समय सीमा 10 मार्च बीत जाने के बाद भी राशि का उपयोग नहीं हो सका है। इसका सीधा असर उन विद्यार्थियों पर पड़ेगा, जिन्हें बेहतर लैब और व्यावसायिक शिक्षा सुविधाएं मिलनी थीं। सरकार जहां शिक्षा सुधार के लिए बड़े बजट जारी कर रही है, वहीं प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही और कथित अनियमितताओं से योजनाओं पर असर पड़ रहा है।
DEO का पक्ष
जारी बजट राशि को वापस करने के आदेश के संबंध में प्रभारी DEO तामेश्वर प्रसाद उपाध्यक्ष ने कहा कि मामले में कोरबा कलेक्टर से मार्गदर्शन लिया जा रहा है। मार्गदर्शन मिलने के बाद ही स्थिति स्पष्ट की जाएगी।
उठते सवाल
जब राशि खर्च करने का अधिकार प्रधानपाठकों को था, तो हस्तक्षेप क्यों किया गया?
क्या ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के लिए प्रक्रिया प्रभावित की गई?
70 लाख की राशि खर्च न होने से हुए नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा?
अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाता है और क्या आरोपों की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारों पर कार्रवाई होती है।





